आयकर अधिनियम, 2025 के साथ आने वाले सबसे महत्वपूर्ण व्यावहारिक परिवर्तनों में से एक TDS प्रावधानों की नई कोड-आधारित नंबरिंग प्रणाली है। यदि आपकी अकाउंटिंग टीम, पेरोल प्रोसेसर या बाहरी अनुपालन सेवा प्रदाता अभी भी 194C (ठेकेदार भुगतान), 194J (पेशेवर शुल्क) या 194H (कमीशन एवं ब्रोकरेज) जैसे पुराने सेक्शन नंबरों का उपयोग कर रहे हैं, तो 1 अप्रैल 2026 के बाद ये संदर्भ तकनीकी रूप से नए कानून के अंतर्गत अप्रचलित माने जाएंगे।
महत्वपूर्ण बात यह है कि TDS की मूल जिम्मेदारी में कोई बदलाव नहीं हुआ है। भुगतान की वही श्रेणियाँ अभी भी TDS के दायरे में हैं, अधिकांश मामलों में दरें भी लगभग समान हैं और जमा करने की अंतिम तिथि भी अगले महीने की 7 तारीख ही बनी हुई है। परिवर्तन केवल सेक्शन संदर्भों में हुआ है। नए अधिनियम में पुनर्गठित सेक्शन तालिका लागू की गई है और अब TDS रिटर्न पोर्टल भी अद्यतन कोड की अपेक्षा करता है।
ऐसे परिवर्तन अक्सर तब तक दिखाई नहीं देते जब तक वे समस्या का कारण न बन जाएँ। कई मामलों में पुराने सेक्शन नंबरों के साथ दाखिल की गई रिटर्न प्रारंभिक रूप से स्वीकार हो सकती है, लेकिन बाद में पोर्टल वैलिडेशन त्रुटि, डेटा असंगति या मूल्यांकन के दौरान स्पष्टीकरण की मांग उत्पन्न कर सकती है। हमने ऐसे उदाहरण देखे हैं जहाँ व्यवसायों ने पुराने पेरोल सॉफ्टवेयर के कारण अनुपालन संबंधी कठिनाइयों का सामना किया।
आपको क्या जाँचना चाहिए? सबसे पहले अपने पेरोल सेवा प्रदाता या अकाउंटिंग सॉफ्टवेयर विक्रेता से लिखित पुष्टि प्राप्त करें कि उनकी प्रणाली नए TDS सेक्शन कोड के अनुरूप अपडेट की जा चुकी है। केवल यह मान लेना पर्याप्त नहीं है कि सामान्य सॉफ्टवेयर अपडेट में यह परिवर्तन स्वतः शामिल कर लिया गया होगा।
यदि आपका संगठन अभी भी स्प्रेडशीट या मैन्युअल प्रक्रिया के माध्यम से TDS की गणना और रिपोर्टिंग करता है, तो आपके टेम्पलेट, कार्यपत्रक और अनुपालन चेकलिस्ट की भी समीक्षा आवश्यक है।
यदि आपको यह स्पष्ट नहीं है कि किसी विशेष भुगतान व्यवस्था, विक्रेता अनुबंध या शुल्क श्रेणी पर नए सेक्शन कोड कैसे लागू होंगे, तो अगली तिमाही TDS रिटर्न दाखिल करने से पहले अपने कर सलाहकार से चर्चा करना समझदारी होगी। समय रहते समीक्षा करने से भविष्य में अनावश्यक नोटिस, संशोधन और अनुपालन जोखिमों से बचा जा सकता है।